Monday, October 22, 2018

पौधों में बनने वाले भोज्य पदार्थों का स्थानान्तरण कैसे होता है?

पौधों में भोज्य पदार्थों का स्थानान्तरण की क्रिया विधि-
Introduction-
पत्तियों द्वारा निर्मित भोज्य पदार्थों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए जिस पदार्थ का प्रयोग किया जाता है, उसे फ्लोएम कहते हैं। पत्तियों द्वारा निर्मित कार्बनिक भोज्य पदार्थ एक विलयन के रूप में तने एवं जड़ में स्थानांतरित किया जाता है। पौधों में खाद्य पदार्थों के जलीय घोल का एक अंग से दूसरे अंग में परिसंचरण होना ही विलेयों या पोषक पदार्थों का स्थानांतरण ( Tranlocation of organic solutes ) कहलाता है।
      इस प्रकार से पौधों में कार्बनिक भोज्य पदार्थों एवं विलेयों के स्थानांतरण का वर्णन दो प्रकार से किया जा सकता है जो की निम्न है -
(A) स्थानांतरण की दिशा 
(B) स्थानांतरण की क्रिया-विधि
(A) स्थानांतरण की दिशा( Direction of translocation )-
इसके आधार पर खाद्य पदार्थों का स्थानांतरण तीन दिशाओं में निम्न प्रकार से होता है-
( 1 ) आरोही स्थानांतरण ( Upward translocation )-
जैसे की इसके नाम से ही ज्ञात होता है की इसका स्थांतरण नीचे से ऊपर की ओर होता है अर्थात आरोही स्थानांतरण होता है। यह स्थांतरण अंकुरण के समय बीज में सञ्चित भोज्य पदार्थों से प्रांकुर की ओर होता है। इस प्रकार के स्थानांतरण की क्रिया तब तक चलती रहती है जब तक की निर्मित नए पौधे में प्रकाश संश्लेषण की क्षमता विकसित नहीं हो जाती है।
( 2 ) अवरोही स्थानांतरण ( Downward translocation ) -
इसके नाम से स्पष्ट है की इस प्रकार का स्थानांतरण ऊपर से नीचे की ओर होता है अर्थात पत्तियों में प्रकाश संश्लेषण के फलस्वरूप बनने वाले कार्बनिक भोज्य पदार्थ विलयन के रूप में तने एवं जड़ों की ओर स्थानांतरित होते हैं,इसे ही अवरोही स्थानांतरण कहते हैं।
(3) पाश्र्वीय स्थानांतरण ( Lateral translocation )-
हमें पता है की पौधों में तीन प्रकार से विकास होता है सबसे पहले उसका अंकुरण होता है उसके बाद उसका विकास और फिर आखरी में पुष्प एवं फल का निर्माण होता है। तो इस हिसाब से अभी तक हमने अंकुरण और विकास तक के भोज्य पदार्थों का स्थानांतरण को देख लिया है। अब पाश्र्वीय स्थानांतरण बीजों एवं फलों के निर्माण के समय तथा कोर्टेक्स एवं पीथ में संग्रहित होने हेतु कार्बनिक पदार्थों के स्थानांतरण को पाश्र्वीय स्थानांतरण कहते हैं।
( B ) कार्बनिक विलेयों के स्थानांतरण की क्रिया-विधि-
कार्बनिक विलेयों के स्थानांतरण की क्रिया-विधि को स्पष्ट करने के लिए दिए गए महत्वपूर्ण सिद्धांत दिए गए जो की आपके समक्ष इस प्रकार से प्रस्तुत है -
( 1 ) विसरण परिकल्पना (Diffusion hypothesis)-
डी व्रीज ( de Vries, 1885 ) के अनुसार, खाद्य पदार्थों का स्थानांतरण अधिक सांद्रता वाले भाग से कम सांद्रता वाले भाग की ओर विसरण प्रक्रिया के द्वारा होता है। पौधों के आपूर्ति भाग ( Supply end ) में भोज्य पदार्थ बनते हैं, जहां पर इसकी सांद्रता अधिक होती है। यहां से यह पौधों के उन भागों में स्थानांतरित होता है, जहां पर इनका उपयोग होता है। इसे उपभोगी सिरा ( Consumption end ) कहते हैं। अतः भोज्य पदार्थों का स्थानांतरण आपूर्ति सिरा से उपभोगी सिरा की ओर होता है।
( 2 ) सक्रिय विसरण परिकल्पना ( Activated Diffusion hypothesis )-
मैसन एवं फिलिस (1936 ) के अनुसार, खाद्य पदार्थों का अधिक सांद्रता से कम सांद्रता की ओर स्थानांतरण उनके सक्रियता ( Activation ) पश्चात ही होता है। पदार्थों के सक्रियण के लिए आवश्यक ऊर्जा श्वसन से प्राप्त होती है।
( 3 ) इलेक्ट्रोऑस्मोटिक सिद्धांत -
फेंसन (1957 ) एवं स्पैनर के अनुसार , चालनी प्लेट्स के आर-पार एक विद्युत विभव उत्पन्न होता है, जिसके प्रभाव में जल के साथ कार्बनिक विलेयों का भी प्रवाह होता है। स्पैनर के अनुसार, चालनी पटलिका की ध्रुवणता का प्रमुख कारण , उसके पास स्थित सखी कोशिकाओं से चालनी पटलिका के एक ओर पोटेशियम + आयनों के अवशोषण एवं दूसरी ओर इनके स्त्रावण के परिणामस्वरूप ही होता है। इस क्रिया में पोटेशियम + आयन चालनी पटलिका के नीचे की ओर स्थित कोशिका से उसकी अनुदैधर्य भित्ति में रिसाव होता है तथा ऊपर की ओर स्थित कोशिका में पोटेशियम पम्प के माध्यम से चालनी नलिका अथवा सखि कोशिकाओं में पम्प कर दिए जाते हैं। इस क्रिया के लिए ऊर्जा A.T.P. से ली जाती है। पोटेशियम + आयनों के प्रवाह के साथ-साथ कार्बनिक विलेयों का भी स्थानांतरण हो जाता है।
     बॉउलिंग ( 1968 ) ने वाइटिस विनिफेरा के प्राथमिक फ्लोएम में उपस्थित चालनी पटलिकाओं के विद्युत विभवांतर का मापन किया तथा इसका मापन 4-48  mV पाया। इन्होंने बताया की वह मान आवश्यक दर के अनुसार पदार्थों के विद्युतीय परासरण के लिए  पर्याप्त होता है।
स्पैनर के अनुसार , चालनी नलिका में शर्करा के अणु पोटेशियम + आयनों के साथ बंधे रहते हैं। अतः विद्युत विभवांतर के प्रभाव के कारण शर्करा के अणु K+ आयनों के साथ गति करते हैं यह सिद्धांत विलेयों के स्थानांतरण सम्बन्धी अनेक समस्याओं को समझाने मे असमर्थ रहा है।
( 4 ) मुंच की द्रव्य प्रवाह या दाब प्रवाह परिकल्पना ( Mnch's mass or pressure flow hypothesis ) -
इस परिकल्पना को मुंच ने सन 1927-30 में प्रतिपादित किया था। मुंच के अनुसार, पौधों में विलेयों का स्थानांतरण जल के द्रव्यमान प्रवाह या दाब प्रवाह के कारण होता है।
  इस सिद्धांत के अनुसार , खाद्य पदार्थों का स्थानांतरण उनके निर्माण स्थल से उपयोग स्थल तक फ्लोयम के माध्यम से सांद्रण प्रवणता के अनुसार होता है।
पत्तियों प्रकाश-संश्लेषण के द्वारा भोज्य पदार्थों ( शर्करा ) का निर्माण करती हैं , जिसके कारण, पत्तियों की मीजोफिल कोशिकाओं में इनकी सांद्रता बढ़ जाती है। अतः इनका परासरण दाब बढ़ जाता है। इस बढ़े हुए परासरण दाब के कारण मीजोफिल कोशिकाएं पत्तियों की जायलम कोशिकाओं से जल का अवशोषण करती हैं, अतः इनका स्फीति दाब बढ़ जाता है। इस स्फीति दाब के प्रभाव से कुछ कोशिकीय विलयन फ्लोएम की चालनी नलिका द्वारा जड़ में संग्रहित हो जाता है अथवा उपभोगी सिरे के द्वारा उपयोग कर लिया जाता है अथवा यह अविलेय रूप में बदल कर संग्रहित कर लिया जाता है। अतः यहाँ का O.P. एवं T.P. कम हो जाता है। ऐसी अवस्था में आपूर्ति सिरे एवं उपभोगी सिरे के मध्य स्फीति दाब प्रवणता उत्पन्न हो जाता है। अतः यहाँ उपस्थित जल का द्रव्यमान प्रवाह, जिसमें विभिन्न प्रकार के विलेय होते हैं, फ्लोएम के ऊपरी भाग से नीचे तक चला जाता है।
उपभोगी सिरे में इन कार्बनिक पदार्थों का उपयोग हो जाता है।
अतः फ्लोएम कोशिकाओं का जल जायलम कोशिकाओं में प्रवेश कर जाता है, अतः जायलम का O.P. कम हो जाता है। यह जल जायलम कोशिकाओं की वाहिनियों के द्वारा पुनः पत्ती की मिजोफिल कोशिकाओं में पहुंच जाता है। चूँकि पत्तियों की मिजोफिल कोशिकाएँ प्रकाश-संश्लेषण के द्वारा निरन्तर भोजन बनाती रहती हैं। अतः इनका O.P. अधिक हो जाता है और जायलम से जल इन मीजोफिल कोशिकाओं में पहुँच जाता है। मीजोफिल कोशिका में यह जल कार्बनिक विलेयों को घोलकर पुनः आपूर्ति सिरे से उपभोगी सिरे की ओर प्रवाहित होते रहता है।
मुंचवाद की आपत्तियाँ -
मुंच की द्रव्य प्रवाह परिकल्पना निम्नलिखित तथ्यों की पुष्ठी करने में असमर्थ है -
( i ) इस परिकल्पना के अनुसार फ्लोएम की चालनी नलिकाएं सम्पूर्ण क्रिया में निष्क्रिय भूमिका अदा करती हैं, जबकि विभिन्न वैज्ञानिकों ने इस क्रिया में A.T.P.  की भूमिका प्रमाणित किया है।
( ii ) इस परिकल्पना में सामान्य रूप से पाये जाने वाले द्विदिशीय स्थानांतरण को स्पष्ट नहीं किया गया है।
( iii ) मुलरोमों एवं मिजोफिल कोशिकाओं के परासरण दाब को उस प्रकार सत्यापित नहीं किया जा सकता, जैसे की इस परिकल्पना के लिए आवश्यक होता है।  
( 5 ) जीवद्रव्य भ्रमण या जीवद्रव्य प्रवाह परिकल्पना ( Streaming of protoplasm hypothesis )
डी. व्रीज ( de Vries, 1885 ) के अनुसार, प्रत्येक चालनी नलिका एवं अन्य कोशिकाओं का कोशिकाद्रव्य जीवद्रव्य भ्रमण करता है तथा चालनी नलिका के एक सिरे से दुसरे की ओर कार्बनिक विलेयों का स्थानांतरण जीवद्रव्य की परिभ्रमण गति के कारण होता है। इस क्रिया के पश्चात ये कार्बनिक विलेय एक चालनी नलिका से दूसरी चालनी नलिका में चालनी छिद्रों के माध्यम से विसरीत हो जाता है। इस प्रकार इन पदार्थों का स्थानांतरण जीवद्रव्य भ्रमण एवं विसरण क्रिया के सम्मिलित प्रभाव के परिणामस्वरूप होता है। यह क्रिया द्विदिशीय होती है।
ऊपर वर्णित सभी सिद्धांतों में आजकल मुंच का द्रव्य या दाब प्रवाह सिद्धांत ही सबसे ज्यादा माना जाता है।
स्थानांतरण को प्रभावित करने वाले कारक
( 1 ) 25 से 30°c तापमान पर कार्बनिक विलेयों के स्थानांतरण की क्रिया सर्वाधिक होती है तथा इससे ऊपर या नीचे के तापमान होने की स्थिति में स्थानांतरण की दर कम हो जाती है।
( 2 ) प्रकाश अप्रत्यक्ष रूप से स्थानांतरण की प्रक्रिया को प्रभावित करता है,क्योकि अधिक प्रकाश संश्लेषण होने की स्थिति में कार्बनिक विलेयों का अधिक स्थानांतरण होता है।
( 3 ) नमी प्रतिबल ( Moisture stress ) की स्थिति कार्बनिक विलेयों के स्थानांतरण को निरुद्ध करती है।
( 4 ) कार्बनिक विलेयों के स्थानांतरण की क्रिया कार्बोहाइड्रेट के सांद्रण पर भी निर्भर करती है। उच्च सांद्रण क्षेत्र से निम्न सांद्रण क्षेत्र की ओर स्थानांतरण होता है।
      
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